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गुलाबी नगर जयपुर के पर्यावरण संत


गुलाबी नगर जयपुर के पर्यावरण संत


Posted By: Ameeta  |  Posted Date: 02-10-2025

   जयपुर पधारें और मालवीय नगर में पर्यावरण संत नवल डागा की 5 मंजिला पर्यावरण प्रयोगशाला नहीं देखें तो सफ़र अधूरा रह जाएगा। उनकी कहानी, उन्हीं की जुबानी। राजस्थान की राजधानी गुलाबी नगर जयपुर अन्तरराष्ट्रीय पर्यटनस्थल है। यहां 1956 की 1 दिसम्बर को शिवरतन डागा के यहां मेरा जन्म हुआ। जयपुर से 6 किमी दूर आगरा रोड पर पालड़ी मीणा गांव में हम रहते थे। वहां साढ़े दस बीघा जमीन थी। पिताजी और ताऊजी चांदरतन जी खेती करते, पैदावार परिजन खाते और अपनों को खिलाते। मां चम्पादेवी और ताईजी कमलादेवी उनकी सक्रिय सहयोगी रहीं। गायें थीं, पर उनका दूध, मक्खन, छाछ कभी नहीं बेचा। मिल बांट कर उपयोग करते। मैं दो भाइयों और चार बहनों में पांचवीं संतान। बचपन से एम.कॉम. करने तक, खेत जाता और पिताजी के साथ कृषि नवाचारों में सहभागी बनता। पिताजी ने जयपुर में जौहरी बाजार में 364 नंबर की दुकान बीज बिक्री के लिए खोली। उनसे प्रेरित होकर 13 जुलाई, 1977 को इसी मार्केट में 366 नंबर की दुकान मैंने ‘कृषि व्यवस्था’ नाम से खोली। यह बन्द है, पर इसी नाम से पर्यावरण ही अंतिम सांस तक एकमात्र कर्मपथ है। इस मध्य 1982 में शारदा से विवाह हुआ। प्रथम दिन से ही वह मेरी पर्यावरण यात्रा के रथ का दूसरा पहिया बन गई। बेटी पिंकी 40 की है। दामाद प्रशांत और दोहिता उदित जब आते हैं, गहराई से समझने लगते हैं, मेरी पर्यावरण संरक्षण कोशिशों को।

कृषि नवाचार

   कईं कृषि नवाचारों में पिताजी के साथ सक्रिय रहा। 103 फुट गहरे कुएं में मोटर नहीं डूबे, इसके लिए ड्रम लगाकर चैन कूपी का सिस्टम बनाया। एक और प्रयोग। जामुन की लकड़ी पानी में गलती नहीं। 40 किग्रा की लकड़ी के साथ दूसरे सिरे पर 40 किग्रा का लोहे का बाट बांधा। इससे कुएं में पानी की गहराई का पता चल जाता है। और हां, एक प्रयोग और भी किया। जिस पौधे को गाय न खाए, उसका स्प्रे किया। पड़ोस में कीट फसल खा जाते, हमारे यहां नहीं।

पर्यावरण संरक्षण यात्रा

   पिताजी ने कहा कि ऐसा काम कर कि तूं जावे तो लोग मेरे को भी याद करें। शुरुआत की खेत पर 20 फुट गुणा 20 फुट दूरी पर अरडू के पेड़ लगाकर। 1987 में मालवीय नगर में मकान बनाया और 2002 में इसे पर्यावरण प्रयोगशाला का स्वरूप दिया। बगल का मकान भी खरीद लिया। 

   पांच मंजिला मकान 24 घंटे मेरी पर्यावरण प्रयोगशाला है। इसका हर कोना पर्यावरण के लिए नया से नया प्रयोग है। 2008 में छत पर बागवानी शुरू की। मकान की छत पर 415 गमले हैं। मचान बांधकर बेल वाली सब्जियां उगाई। खुद और मेहमानों के लिए इनका उपयोग होता है। मकानों की दीवारों और गिफ्ट पर मेरे लिखे दोहे हैं। किसी पर भी नीचे की 5 मात्राएं नहीं। स्कूल में मास्टर सीताराम शर्मा से इन्हें सीखा। एक लाख से अधिक दोहे लिखे। 1978 से पुनर्चक्रण कागज पर 4 से 6 रुपए मूल्य की 557 पुस्तकें छप चुकी हैं। सिर्फ गाय हजारा व पर्यावरण हजारा 9-9 रुपए की हैं। कोई कॉपीराइट नहीं, इन पर छपा होता है। इनका कोई भी बिना अनुमति उपयोग कर सकता है। 1279 तरह की भांत-भांत की गिफ्ट पर लोगों के नाम और दोहे हैं। 

   पक्षियों के भोजन और पानी की स्टील की 37-37 ट्रे पर हमारे पूर्वजों के नाम हैं। उनका जन्मदिन और मोक्ष दिन भी अंकित है। घर पर लगे 37 घोंसलों में 39 प्रजाति के सैकड़ों पक्षी रोजाना आते हैं। पक्षियों को 7 तरह का अनाज खिलाते हैं। हमारे घर पर 5257 टाइलों पर पर्यावरण और वन्य जीवन के लिए संदेश हैं। 

   सीढ़ियों पर क्रम संख्या भी अंकित है। गाय हो या पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न धारक, मेरी पर्यावरण शृंखला में निरन्तर चहचहाते हैं। साहित्य रचना में मुख्य रूप से रहे - पेड़, वन्यजीव, पानी, पर्यावरण, जैव विविधता, ओजोन, पृथ्वी, बाघ, मोर, हाथी, पक्षी, गोरैया, गिद्ध, रीछ, मगरमच्छ, गोडावण, भू-जल संरक्षण, पुराणों, जैन धर्म और कुरआन शरीफ में वृक्ष महात्म्य, पालिथीन चालीसा और शतक, किसान, गाय, गंगा, छाछ, रक्तदान, नेत्रदान, अंगदान, देहदान, मां, पिताजी, गुटखा, श्मशान आदि। पुस्तकें और गिफ्ट अधिकांश हिन्दीभाषी प्रदेशों में वन विभाग के जरिए पहुंचाए गए हैं।   

  सम्मान 

  • 2003 : वन विभाग, राजस्थान द्वारा ‘वन पंडित’
  • 2006 : राजस्थान सरकार द्वारा ‘वानिकी पंडित’

पधारें, अनुभव साझा करने के लिए

नवल डागा, बी-314, हरि मार्ग, मालवीय नगर, जयपुर-302017,  ईमेल: navaldaga1956@gmail.com,  मोबाइल: 9460142430


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